श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

एवं प्रगायन् नृपदेवदेवः स उर्वशीलोकमथो विहाय।

आत्मानमात्मन्यवगम्य मां वै उपारमज्ज्ञानविधूतमोहः ॥ २५

evaṃ pragāyan nṛpadevadevaḥ sa urvaśīlokamatho vihāya|

ātmānamātmanyavagamya māṃ vai upāramajjñānavidhūtamohaḥ || 25

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—उद्धवजी! राजराजेश्‍वर पुरूरवाके मनमें जब इस तरहके उद्गार उठने लगे, तब उसने उर्वशीलोकका परित्याग कर दिया। अब ज्ञानोदय होनेके कारण उसका मोह जाता रहा और उसने अपने हृदयमें ही आत्मस्वरूपसे मेरा साक्षात्कार कर लिया और वह शान्तभावमें स्थित हो गया॥ २५॥

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