श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

त्यक्त्वाऽऽत्मानं व्रजन्तीं तां न‌ग्‍न उन्मत्तवन्‍नृपः।

विलपन्‍नन्वगाज्जाये घोरे तिष्ठेति विक्लवः॥ ५

tyaktvā''tmānaṃ vrajantīṃ tāṃ nagna unmattavannṛpaḥ|

vilapannanvagājjāye ghore tiṣṭheti viklavaḥ|| 5

अर्थ

राजा पुरूरवा न‌ग्‍न होकर पागलकी भाँति अपनेको छोड़कर भागती हुई उर्वशीके पीछे अत्यन्त विह्वल होकर दौड़ने लगा और कहने लगा—‘देवि! निष्ठुर हृदये! थोड़ी देर ठहर जा, भाग मत’॥ ५॥

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