श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

कामानतृप्तोऽनुजुषन् क्षुल्लकान् वर्षयामिनीः।

न वेद यान्तीर्नायान्तीरुर्वश्याकृष्टचेतनः॥ ६

kāmānatṛpto'nujuṣan kṣullakān varṣayāminīḥ|

na veda yāntīrnāyāntīrurvaśyākṛṣṭacetanaḥ|| 6

अर्थ

उर्वशीने उनका चित्त आकृष्ट कर लिया था। उन्हें तृप्ति नहीं हुई थी। वे क्षुद्र विषयोंके सेवनमें इतने डूब गये थे कि उन्हें वर्षोंकी रात्रियाँ न जाती मालूम पड़ीं और न तो आतीं॥ ६॥

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