॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.27.34
गुडपायससर्पींषि शष्कुल्यापूपमोदकान्।
संयावदधिसूपांश्च नैवेद्यं सति कल्पयेत्॥ ३४
guḍapāyasasarpīṃṣi śaṣkulyāpūpamodakān|
saṃyāvadadhisūpāṃśca naivedyaṃ sati kalpayet|| 34
अर्थ
यदि हो सके तो गुड़, खीर, घृत, पूड़ी, पूए, लड्डू, हलुआ, दही और दाल आदि विविध व्यंजनोंका नैवेद्य लगावे॥ ३४॥