॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.28.22
अविद्यमानोऽप्यवभासते यो
वैकारिको राजससर्ग एषः।
ब्रह्म स्वयंज्योतिरतो विभाति
ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २२
avidyamāno'pyavabhāsate yo
vaikāriko rājasasarga eṣaḥ|
brahma svayaṃjyotirato vibhāti
brahmendriyārthātmavikāracitram || 22
अर्थ
यह जो विकारमयी राजस सृष्टि है, यह न होनेपर भी दीख रही है। यह स्वयंप्रकाश ब्रह्म ही है। इसलिये इन्द्रिय, विषय, मन और पञ्चभूतादि जितने चित्र-विचित्र नामरूप हैं उनके रूपमें ब्रह्म ही प्रतीत हो रहा है॥ २२॥