श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

एवं स्फुटं ब्रह्मविवेकहेतुभिः

परापवादेन विशारदेन।

छित्त्वाऽऽत्मसन्देहमुपारमेत

स्वानन्दतुष्टोऽखिलकामुकेभ्यः॥ २३

evaṃ sphuṭaṃ brahmavivekahetubhiḥ

parāpavādena viśāradena|

chittvā''tmasandehamupārameta

svānandatuṣṭo'khilakāmukebhyaḥ|| 23

अर्थ

ब्रह्मविचारके साधन हैं—श्रवण, मनन, निदिध्यासन और स्वानुभूति। उनमें सहायक हैं—आत्मज्ञानी गुरुदेव! इनके द्वारा विचार करके स्पष्टरूपसे देहादि अनात्म पदार्थोंका निषेध कर देना चाहिये। इस प्रकार निषेधके द्वारा आत्मविषयक सन्देहोंको छिन्‍न-भिन्‍न करके अपने आनन्दस्वरूप आत्मामें ही म‌ग्‍न हो जाय और सब प्रकारकी विषयवासनाओंसे रहित हो जाय॥ २३॥

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