॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.28.3
तैजसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतनः।
मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्वन्नानार्थदृक् पुमान्॥ ३
taijase nidrayā''panne piṇḍastho naṣṭacetanaḥ|
māyāṃ prāpnoti mṛtyuṃ vā tadvannānārthadṛk pumān|| 3
अर्थ
उद्धवजी! सभी इन्द्रियाँ राजस अहंकारके कार्य हैं। जब वे निद्रित हो जाती हैं तब शरीरका अभिमानी जीव चेतनाशून्य हो जाता है; अर्थात् उसे बाहरी शरीरकी स्मृति नहीं रहती। उस समय यदि मन बच रहा, तब तो वह सपनेके झूठे दृश्योंमें भटकने लगता है और वह भी लीन हो गया, तब तो जीव मृत्युके समान गाढ़ निद्रा—सुषुप्तिमें लीन हो जाता है। वैसे ही जब जीव अपने अद्वितीय आत्मस्वरूपको भूलकर नाना वस्तुओंका दर्शन करने लगता है तब वह स्वप्नके समान झूठे दृश्योंमें फँस जाता है; अथवा मृत्युके समान अज्ञानमें लीन हो जाता है॥ ३॥✎ 1770