श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.4

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत्।

वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च॥ ४

kiṃ bhadraṃ kimabhadraṃ vā dvaitasyāvastunaḥ kiyat|

vācoditaṃ tadanṛtaṃ manasā dhyātameva ca|| 4

अर्थ

उद्धवजी! जब द्वैत नामकी कोई वस्तु ही नहीं है, तब उसमें अमुक वस्तु भली है और अमुक बुरी, अथवा इतनी भली और इतनी बुरी है—यह प्रश्‍न ही नहीं उठ सकता। विश्‍वकी सभी वस्तुएँ वाणीसे कही जा सकती हैं अथवा मनसे सोची जा सकती हैं; इसलिये दृश्य एवं अनित्य होनेके कारण उनका मिथ्यात्व तो स्पष्ट ही है॥ ४॥✎ 1770

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1770 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परमार्थ-दृष्टिसे → परमार्थदृष्टिसे

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें