॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.28.37
यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पंचवर्णमबाधितम्।
व्यर्थेनाप्यर्थवादोऽयं द्वयं पण्डितमानिनाम्॥ ३७
yannāmākṛtibhirgrāhyaṃ paṃcavarṇamabādhitam|
vyarthenāpyarthavādo'yaṃ dvayaṃ paṇḍitamāninām|| 37
अर्थ
बहुत-से पण्डिताभिमानी लोग ऐसा कहते हैं कि यह पाञ्चभौतिक द्वैत विभिन्न नामों और रूपोंके रूपमें इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण किया जाता है, इसलिये सत्य है। परन्तु यह तो अर्थहीन वाणीका आडम्बरमात्र है; क्योंकि तत्त्वतः तो इन्द्रियोंकी पृथक् सत्ता ही सिद्ध नहीं होती, फिर वे किसीको प्रमाणित कैसे करेंगी?॥ ३७॥