उद्धवजी! यदि योगसाधना पूर्ण होनेके पहले ही किसी साधकका शरीर रोगादि उपद्रवोंसे पीड़ित हो, तो उसे इन उपायोंका आश्रय लेना चाहिये॥ ३८॥
योगिनोऽपक्वयोगस्य युंजतः काय उत्थितैः।
उपसर्गैर्विहन्येत तत्रायं विहितो विधिः॥ ३८
उद्धवजी! यदि योगसाधना पूर्ण होनेके पहले ही किसी साधकका शरीर रोगादि उपद्रवोंसे पीड़ित हो, तो उसे इन उपायोंका आश्रय लेना चाहिये॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.28.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 889) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/28/38/