॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.29.15
नरेष्वभीक्ष्णं मद्भावं पुंसो भावयतोऽचिरात्।
स्पर्धासूयातिरस्काराः साहंकारा वियन्ति हि॥ १५
nareṣvabhīkṣṇaṃ madbhāvaṃ puṃso bhāvayato'cirāt|
spardhāsūyātiraskārāḥ sāhaṃkārā viyanti hi|| 15
अर्थ
जब निरन्तर सभी नर-नारियोंमें मेरी ही भावना की जाती है, तब थोड़े ही दिनोंमें साधकके चित्तसे स्पर्द्धा (होड़), ईर्ष्या, तिरस्कार और अहंकार आदि दोष दूर हो जाते हैं॥ १५॥✎ 2001