श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

यावत् सर्वेषु भूतेषु मद्भावो नोपजायते।

तावदेवमुपासीत वाङ्मनःकायवृत्तिभिः॥ १७

yāvat sarveṣu bhūteṣu madbhāvo nopajāyate|

tāvadevamupāsīta vāṅmanaḥkāyavṛttibhiḥ|| 17

अर्थ

जबतक समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना—भगवद्भावना न होने लगे, तबतक इस प्रकारसे मन, वाणी और शरीरके सभी संकल्पों और कर्मोंद्वारा मेरी उपासना करता रहे॥ १७॥✎ 2001

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2001 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): धीर- → धीरे-

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें