श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

एतैर्दोषैर्विहीनाय ब्रह्मण्याय प्रियाय च।

साधवे शुचये ब्रूयाद् भक्तिः स्याच्छूद्रयोषिताम्॥ ३१

etairdoṣairvihīnāya brahmaṇyāya priyāya ca|

sādhave śucaye brūyād bhaktiḥ syācchūdrayoṣitām|| 31

अर्थ

जो इन दोषोंसे रहित हो, ब्राह्मणभक्त हो, प्रेमी हो, साधुस्वभाव हो और जिसका चरित्र पवित्र हो, उसीको यह प्रसंग सुनाना चाहिये। यदि शूद्र और स्त्री भी मेरे प्रति प्रेम-भक्ति रखते हों तो उन्हें भी इसका उपदेश करना चाहिये॥ ३१॥

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