जैसे दिव्य अमृतपान कर लेनेपर कुछ भी पीना शेष नहीं रहता, वैसे ही यह जान लेनेपर जिज्ञासुके लिये और कुछ भी जानना शेष नहीं रहता॥ ३२॥
नैतद् विज्ञाय जिज्ञासोर्ज्ञातव्यमवशिष्यते।
पीत्वा पीयूषममृतं पातव्यं नावशिष्यते॥ ३२
जैसे दिव्य अमृतपान कर लेनेपर कुछ भी पीना शेष नहीं रहता, वैसे ही यह जान लेनेपर जिज्ञासुके लिये और कुछ भी जानना शेष नहीं रहता॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.29.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 894) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/29/32/