श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.39

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

वृक्णश्‍च मे सुदृढः स्नेहपाशो

दाशार्हवृष्ण्यन्धकसात्वतेषु ।

प्रसारितः सृष्टिविवृद्धये त्वया

स्वमायया ह्यात्मसुबोधहेतिना॥ ३९

vṛkṇaśca me sudṛḍhaḥ snehapāśo

dāśārhavṛṣṇyandhakasātvateṣu |

prasāritaḥ sṛṣṭivivṛddhaye tvayā

svamāyayā hyātmasubodhahetinā|| 39

अर्थ

आपने अपनी मायासे सृष्टिवृद्धिके लिये दाशार्ह, वृष्णि, अन्धक और सात्वतवंशी यादवोंके साथ मुझे सुदृढ़ स्नेह-पाशसे बाँध दिया था। आज आपने आत्मबोधकी तीखी तलवारसे उस बन्धनको अनायास ही काट डाला॥ ३९॥✎ 906

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #906 शब्दोंके बीचका स्थान: देऔर → दे और

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