श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.40

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

नमोऽस्तु ते महायोगिन् प्रपन्‍नमनुशाधि माम्।

यथा त्वच्चरणाम्भोजे रतिः स्यादनपायिनी॥ ४०

namo'stu te mahāyogin prapannamanuśādhi mām|

yathā tvaccaraṇāmbhoje ratiḥ syādanapāyinī|| 40

अर्थ

महायोगेश्‍वर! मेरा आपको नमस्कार है। अब आप कृपा करके मुझ शरणागतको ऐसी आज्ञा दीजिये, जिससे आपके चरणकमलोंमें मेरी अनन्य भक्ति बनी रहे॥ ४०॥✎ 906

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #906 शब्दोंके बीचका स्थान: देऔर → दे और

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