श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.4

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

एवं सृष्टानि भूतानि प्रविष्टः पंचधातुभिः।

एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजंजुषते गुणान्॥ ४

evaṃ sṛṣṭāni bhūtāni praviṣṭaḥ paṃcadhātubhiḥ|

ekadhā daśadhā''tmānaṃ vibhajaṃjuṣate guṇān|| 4

अर्थ

इस प्रकार पंचमहाभूतोंके द्वारा बने हुए प्राणि-शरीरोंमें उन्होंने अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश किया और अपनेको ही पहले एक मनके रूपमें और इसके बाद पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा पाँच कर्मेन्द्रिय—इन दस रूपोंमें विभक्त कर दिया तथा उन्हींके द्वारा विषयोंका भोग कराने लगे॥ ४॥

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