वह देहाभिमानी जीव अन्तर्यामीके द्वारा प्रकाशित इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका भोग करता है और इस पंचभूतोंके द्वारा निर्मित शरीरको आत्मा—अपना स्वरूप मानकर उसीमें आसक्त हो जाता है। (यह भगवान्की माया है)॥ ५॥
गुणैर्गुणान् स भुंजान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः।
मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते॥ ५
वह देहाभिमानी जीव अन्तर्यामीके द्वारा प्रकाशित इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका भोग करता है और इस पंचभूतोंके द्वारा निर्मित शरीरको आत्मा—अपना स्वरूप मानकर उसीमें आसक्त हो जाता है। (यह भगवान्की माया है)॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.3.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 722) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/5/