अब वह कर्मेन्द्रियोंसे सकाम कर्म करता है और उनके अनुसार शुभ कर्मका फल सुख और अशुभ कर्मका फल दुःख भोग करने लगता है और शरीरधारी होकर इस संसारमें भटकने लगता है। यह भगवान्की माया है॥ ६॥
कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत्।
तत्तत् कर्मफलं गृह्णन् भ्रमतीह सुखेतरम्॥ ६
अब वह कर्मेन्द्रियोंसे सकाम कर्म करता है और उनके अनुसार शुभ कर्मका फल सुख और अशुभ कर्मका फल दुःख भोग करने लगता है और शरीरधारी होकर इस संसारमें भटकने लगता है। यह भगवान्की माया है॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.3.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 722) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/6/