इस प्रकार यह जीव ऐसी अनेक अमंगलमय कर्मगतियोंको, उनके फलोंको प्राप्त होता है और महाभूतोंके प्रलयपर्यन्त विवश होकर जन्मके बाद मृत्यु और मृत्युके बाद जन्मको प्राप्त होता रहता है—यह भगवान्की माया है॥ ७॥
इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रवहाः पुमान्।
आभूतसम्प्लवात् सर्गप्रलयावश्नुतेऽवशः॥ ७
इस प्रकार यह जीव ऐसी अनेक अमंगलमय कर्मगतियोंको, उनके फलोंको प्राप्त होता है और महाभूतोंके प्रलयपर्यन्त विवश होकर जन्मके बाद मृत्यु और मृत्युके बाद जन्मको प्राप्त होता रहता है—यह भगवान्की माया है॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.3.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 722) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/7/