अपने-आपको भगवन्मय ध्यान करते हुए ही भगवान्की मूर्तिका पूजन करना चाहिये। निर्माल्यको अपने सिरपर रखे और आदरके साथ भगवद्विग्रहको यथास्थान स्थापित कर पूजा समाप्त करनी चाहिये॥ ५४॥
आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद्धरेः।
शेषामाधाय शिरसि स्वधाम्न्युद्वास्य सत्कृतम्॥ ५४
अपने-आपको भगवन्मय ध्यान करते हुए ही भगवान्की मूर्तिका पूजन करना चाहिये। निर्माल्यको अपने सिरपर रखे और आदरके साथ भगवद्विग्रहको यथास्थान स्थापित कर पूजा समाप्त करनी चाहिये॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.3.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 731) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/54/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)