श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.55

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

एवम‌ग्‍न्यर्कतोयादावतिथौ हृदये च यः।

यजतीश्‍वरमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः॥ ५५

evamagnyarkatoyādāvatithau hṛdaye ca yaḥ|

yajatīśvaramātmānamacirānmucyate hi saḥ|| 55

अर्थ

इस प्रकार जो पुरुष अग्‍नि, सूर्य, जल, अतिथि और अपने हृदयमें आत्मरूप श्रीहरिकी पूजा करता है, वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है॥ ५५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे
तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥

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