परीक्षित्! बलरामजीने समुद्रतटपर बैठकर एकाग्रचित्तसे परमात्मचिन्तन करते हुए अपने आत्माको आत्मस्वरूपमें ही स्थिर कर लिया और मनुष्यशरीर छोड़ दिया॥ २६॥✎ 1774
रामः समुद्रवेलायां योगमास्थाय पौरुषम्।
तत्याज लोकं मानुष्यं संयोज्यात्मानमात्मनि॥ २६
परीक्षित्! बलरामजीने समुद्रतटपर बैठकर एकाग्रचित्तसे परमात्मचिन्तन करते हुए अपने आत्माको आत्मस्वरूपमें ही स्थिर कर लिया और मनुष्यशरीर छोड़ दिया॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.30.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 900) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/30/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)