श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.41

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

दारुकः कृष्णपदवीमन्विच्छन्‍नधिगम्य ताम्।

वायुं तुलसिकामोदमाघ्रायाभिमुखं ययौ॥ ४१

dārukaḥ kṛṣṇapadavīmanvicchannadhigamya tām|

vāyuṃ tulasikāmodamāghrāyābhimukhaṃ yayau|| 41

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णका सारथि दारुक उनके स्थानका पता लगाता हुआ उनके द्वारा धारण की हुई तुलसीकी गन्धसे युक्त वायु सूँघकर और उससे उनके होनेके स्थानका अनुमान लगाकर सामनेकी ओर गया॥ ४१॥✎ 907 1775

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #907 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1775 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गरुड़-ध्वज → गरुड़ध्वज

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