श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.43

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

अपश्यतस्त्वच्चरणाम्बुजं प्रभो

दृष्टिः प्रनष्टा तमसि प्रविष्टा।

दिशो न जाने न लभे च शान्तिं

यथा निशायामुडुपे प्रनष्टे॥ ४३

apaśyatastvaccaraṇāmbujaṃ prabho

dṛṣṭiḥ pranaṣṭā tamasi praviṣṭā|

diśo na jāne na labhe ca śāntiṃ

yathā niśāyāmuḍupe pranaṣṭe|| 43

अर्थ

उसने भगवान्‌से प्रार्थना की—‘प्रभो! रात्रिके समय चन्द्रमाके अस्त हो जानेपर राह चलनेवालेकी जैसी दशा हो जाती है, आपके चरणकमलोंका दर्शन न पाकर मेरी भी वैसी ही दशा हो गयी है। मेरी दृष्टि नष्ट हो गयी है, चारों ओर अँधेरा छा गया है। अब न तो मुझे दिशाओंका ज्ञान है और न मेरे हृदयमें शान्ति ही है’॥ ४३॥✎ 907 1775

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #907 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1775 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गरुड़-ध्वज → गरुड़ध्वज

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें