परीक्षित्! अभी दारुक इस प्रकार कह ही रहा था कि उसके सामने ही भगवान्का गरुड़ध्वज रथ पताका और घोड़ोंके साथ आकाशमें उड़ गया॥ ४४॥✎ 9071775
इति ब्रुवति सूते वै रथो गरुडलाञ्छनः।
खमुत्पपात राजेन्द्र साश्वध्वज उदीक्षतः॥ ४४
परीक्षित्! अभी दारुक इस प्रकार कह ही रहा था कि उसके सामने ही भगवान्का गरुड़ध्वज रथ पताका और घोड़ोंके साथ आकाशमें उड़ गया॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.30.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 902) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/30/44/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)