श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.31.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

तत्र स्म त्वरिता जग्मुः कृष्णविश्‍लेषविह्वलाः।

व्यसवः शेरते यत्र ज्ञातयो घ्नन्त आननम्॥ १७

tatra sma tvaritā jagmuḥ kṛṣṇaviśleṣavihvalāḥ|

vyasavaḥ śerate yatra jñātayo ghnanta ānanam|| 17

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णके वियोगसे विह्वल होकर वे लोग सिर पीटते हुए वहाँ तुरंत पहुँचे, जहाँ उनके भाई-बन्धु निष्प्राण होकर पड़े हुए थे॥ १७॥✎ 1776 1777

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1776 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भगव-द्विरहसे → भगवद्विरहसे
  • #1777 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सँभाल-कर → सँभालकर

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