श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.31.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

पितरः सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगाः।

चारणा यक्षरक्षांसि किन्‍नराप्सरसो द्विजाः॥ २✎ 1945

pitaraḥ siddhagandharvā vidyādharamahoragāḥ|

cāraṇā yakṣarakṣāṃsi kinnarāpsaraso dvijāḥ|| 2

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! दारुकके चले जानेपर ब्रह्माजी, शिव-पार्वती, इन्द्रादि लोकपाल, मरीचि आदि प्रजापति, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, पितर-सिद्ध, गन्धर्व-विद्याधर, नाग-चारण, यक्ष-राक्षस, किन्‍नर-अप्सराएँ तथा गरुड़लोकके विभिन्‍न पक्षी अथवा मैत्रेय आदि ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परमधाम-प्रस्थानको देखनेके लिये बड़ी उत्सुकतासे वहाँ आये। वे सभी भगवान् श्रीकृष्णके जन्म और लीलाओंका गान अथवा वर्णन कर रहे थे। उनके विमानोंसे सारा आकाश भर-सा गया था। वे बड़ी भक्तिसे भगवान्‌पर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे॥ १—४॥

यह अर्थ श्लोक 1–4 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1945 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): चारणा: → चारणा

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