श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

ते देवानुचरा दृष्ट्वा स्त्रियः श्रीरिव रूपिणीः।

गन्धेन मुमुहुस्तासां रूपौदार्यहतश्रियः॥ १३

te devānucarā dṛṣṭvā striyaḥ śrīriva rūpiṇīḥ|

gandhena mumuhustāsāṃ rūpaudāryahataśriyaḥ|| 13

अर्थ

जब देवराज इन्द्रके अनुचरोंने उन लक्ष्मीजीके समान रूपवती स्त्रियोंको देखा, तब उनके महान् सौन्दर्यके सामने उनका चेहरा फीका पड़ गया, वे श्रीहीन होकर उनके शरीरसे निकलनेवाली दिव्य सुगन्धसे मोहित हो गये॥ १३॥✎ 1728

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1728 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्वर्ग-लोककी → स्वर्गलोककी

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