जब देवराज इन्द्रके अनुचरोंने उन लक्ष्मीजीके समान रूपवती स्त्रियोंको देखा, तब उनके महान् सौन्दर्यके सामने उनका चेहरा फीका पड़ गया, वे श्रीहीन होकर उनके शरीरसे निकलनेवाली दिव्य सुगन्धसे मोहित हो गये॥ १३॥✎ 1728
ते देवानुचरा दृष्ट्वा स्त्रियः श्रीरिव रूपिणीः।
गन्धेन मुमुहुस्तासां रूपौदार्यहतश्रियः॥ १३
जब देवराज इन्द्रके अनुचरोंने उन लक्ष्मीजीके समान रूपवती स्त्रियोंको देखा, तब उनके महान् सौन्दर्यके सामने उनका चेहरा फीका पड़ गया, वे श्रीहीन होकर उनके शरीरसे निकलनेवाली दिव्य सुगन्धसे मोहित हो गये॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.4.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 734) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)