श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

इन्द्रायानम्य सदसि शृण्वतां त्रिदिवौकसाम्।

ऊचुर्नारायणबलं शक्रस्तत्रास विस्मितः॥ १६

indrāyānamya sadasi śṛṇvatāṃ tridivaukasām|

ūcurnārāyaṇabalaṃ śakrastatrāsa vismitaḥ|| 16

अर्थ

वहाँ पहुँचकर उन्होंने इन्द्रको नमस्कार किया तथा भरी सभामें देवताओंके सामने भगवान् नर-नारायणके बल और प्रभावका वर्णन किया। उसे सुनकर देवराज इन्द्र अत्यन्त भयभीत और चकित हो गये॥ १६॥✎ 1728

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1728 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्वर्ग-लोककी → स्वर्गलोककी

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