श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं

दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः।

विष्णुः शिवाय जगतां कलयावतीर्ण-

स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये॥ १७

haṃsasvarūpyavadadacyuta ātmayogaṃ

dattaḥ kumāra ṛṣabho bhagavān pitā naḥ|

viṣṇuḥ śivāya jagatāṃ kalayāvatīrṇa-

stenāhṛtā madhubhidā śrutayo hayāsye|| 17

अर्थ

भगवान् विष्णुने अपने स्वरूपमें एकरस स्थित रहते हुए भी सम्पूर्ण जगत‍्के कल्याणके लिये बहुत-से कलावतार ग्रहण किये हैं। विदेहराज! हंस, दत्तात्रेय, सनक-सनन्दन-सनातन-सनत्कुमार और हमारे पिता ऋषभके रूपमें अवतीर्ण होकर उन्होंने आत्मसाक्षात्कारके साधनोंका उपदेश किया है। उन्होंने ही हयग्रीव-अवतार लेकर मधु-कैटभ नामक असुरोंका संहार करके उन लोगोंके द्वारा चुराये हुए वेदोंका उद्धार किया है॥ १७॥

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