श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

गुप्तोऽप्यये मनुरिलौषधयश्‍च मात्स्ये

क्रौडे हतो दितिज उद्धरताम्भसः क्ष्माम्।

कौर्मे धृतोऽद्रिरमृतोन्मथने स्वपृष्ठे

ग्राहात् प्रपन्‍नमिभराजममुञ्चदार्तम्॥ १८

gupto'pyaye manurilauṣadhayaśca mātsye

krauḍe hato ditija uddharatāmbhasaḥ kṣmām|

kaurme dhṛto'driramṛtonmathane svapṛṣṭhe

grāhāt prapannamibharājamamuñcadārtam|| 18

अर्थ

प्रलयके समय मत्स्यावतार लेकर उन्होंने भावी मनु सत्यव्रत, पृथ्वी और ओषधियोंकी—धान्यादिकी रक्षा की और वराहावतार ग्रहण करके पृथ्वीका रसातलसे उद्धार करते समय हिरण्याक्षका संहार किया। कूर्मावतार ग्रहण करके उन्हीं भगवान्‌ने अमृत-मन्थनका कार्य सम्पन्‍न करनेके लिये अपनी पीठपर मन्दराचल धारण किया और उन्हीं भगवान् विष्णुने अपने शरणागत एवं आर्त भक्त गजेन्द्रको ग्राहसे छुड़ाया॥ १८॥

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