श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.19

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

संस्तुन्वतोऽब्धिपतिताञ्छ्रमणानृषींश्‍च

शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम्।

देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा

जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे॥ १९

saṃstunvato'bdhipatitāñchramaṇānṛṣīṃśca

śakraṃ ca vṛtravadhatastamasi praviṣṭam|

devastriyo'suragṛhe pihitā anāthā

jaghne'surendramabhayāya satāṃ nṛsiṃhe|| 19

अर्थ

एक बार वालखिल्य ऋषि तपस्या करते-करते अत्यन्त दुर्बल हो गये थे। वे जब कश्यप ऋषिके लिये समिधा ला रहे थे तो थककर गायके खुरसे बने हुए गड्ढेमें गिर पड़े, मानो समुद्रमें गिर गये हों। उन्होंने जब स्तुति की, तब भगवान्‌ने अवतार लेकर उनका उद्धार किया। वृत्रासुरको मारनेके कारण जब इन्द्रको ब्रह्महत्या लगी और वे उसके भयसे भागकर छिप गये, तब भगवान्‌ने उस हत्यासे इन्द्रकी रक्षा की; और जब असुरोंने अनाथ देवांगनाओंको बंदी बना लिया, तब भी भगवान्‌ने ही उन्हें असुरोंके चंगुलसे छुड़ाया। जब हिरण्यकशिपुके कारण प्रह्लाद आदि संत पुरुषोंको भय पहुँचने लगा तब उनको निर्भय करनेके लिये भगवान्‌ने नृसिंहावतार ग्रहण किया और हिरण्यकशिपुको मार डाला॥ १९॥✎ 1729

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1729 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: हैहय-वंशका → हैहयवंशका

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