॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.5.18
हित्वात्यायासरचिता गृहापत्यसुहृच्छ्रियः।
तमो विशन्त्यनिच्छन्तो वासुदेवपराङ्मुखाः॥ १८
hitvātyāyāsaracitā gṛhāpatyasuhṛcchriyaḥ|
tamo viśantyanicchanto vāsudevaparāṅmukhāḥ|| 18
अर्थ
राजन्! जो लोग अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णसे विमुख हैं, वे अत्यन्त परिश्रम करके गृह, पुत्र, मित्र और धन-सम्पत्ति इकट्ठी करते हैं; परन्तु उन्हें अन्तमें सब कुछ छोड़ देना पड़ता है और न चाहनेपर भी विवश होकर घोर नरकमें जाना पड़ता है। (भगवान्का भजन न करनेवाले विषयी पुरुषोंकी यही गति होती है)॥ १८॥✎ 902 1732 1733