श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

हित्वात्यायासरचिता गृहापत्यसुहृच्छ्रियः।

तमो विशन्त्यनिच्छन्तो वासुदेवपराङ्मुखाः॥ १८

hitvātyāyāsaracitā gṛhāpatyasuhṛcchriyaḥ|

tamo viśantyanicchanto vāsudevaparāṅmukhāḥ|| 18

अर्थ

राजन्! जो लोग अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णसे विमुख हैं, वे अत्यन्त परिश्रम करके गृह, पुत्र, मित्र और धन-सम्पत्ति इकट्ठी करते हैं; परन्तु उन्हें अन्तमें सब कुछ छोड़ देना पड़ता है और न चाहनेपर भी विवश होकर घोर नरकमें जाना पड़ता है। (भगवान्‌का भजन न करनेवाले विषयी पुरुषोंकी यही गति होती है)॥ १८॥✎ 902 1732 1733

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #902 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1732 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: काल-भगवान् → कालभगवान्
  • #1733 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मानने-वाले → माननेवाले

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें