श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.50

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

भूभारासुरराजन्यहन्तवे गुप्तये सताम्।

अवतीर्णस्य निर्वृत्यै यशो लोके वितन्यते॥ ५०

bhūbhārāsurarājanyahantave guptaye satām|

avatīrṇasya nirvṛtyai yaśo loke vitanyate|| 50

अर्थ

वे पृथ्वीके भारभूत राजवेषधारी असुरोंका नाश और संतोंकी रक्षा करनेके लिये तथा जीवोंको परम शान्ति और मुक्ति देनेके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं और इसीके लिये जगत‍्में उनकी कीर्ति भी गायी जाती है॥ ५०॥

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