श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.51

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एतच्छ्रुत्वा महाभागो वसुदेवोऽतिविस्मितः।

देवकी च महाभागा जहतुर्मोहमात्मनः॥ ५१

etacchrutvā mahābhāgo vasudevo'tivismitaḥ|

devakī ca mahābhāgā jahaturmohamātmanaḥ|| 51

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्! नारदजीके मुखसे यह सब सुनकर परम भाग्यवान् वसुदेवजी और परम भाग्यवती देवकीजीको बड़ा ही विस्मय हुआ। उनमें जो कुछ माया-मोह अवशेष था, उसे उन्होंने तत्क्षण छोड़ दिया॥ ५१॥

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