श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम्।

गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुद्वेलेन विनङ्क्ष्यति॥ ३०

yadyasaṃhṛtya dṛptānāṃ yadūnāṃ vipulaṃ kulam|

gantāsmyanena loko'yamudvelena vinaṅkṣyati|| 30

अर्थ

यदि मैं घमंडी और उच्छृंखल यदुवंशियोंका यह विशाल वंश नष्ट किये बिना ही चला जाऊँगा तो ये सब मर्यादाका उल्लंघन करके सारे लोकोंका संहार कर डालेंगे॥ ३०॥

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