श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

सत्यस्य ते स्वदृश आत्मन आत्मनोऽन्यं

वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे।

सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे

ब्रह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः॥ १७

satyasya te svadṛśa ātmana ātmano'nyaṃ

vaktāramīśa vibudheṣvapi nānucakṣe|

sarve vimohitadhiyastava māyayeme

brahmādayastanubhṛto bahirarthabhāvāḥ|| 17

अर्थ

मेरे प्रभो! आप भूत, भविष्य, वर्तमान इन तीनों कालोंसे अबाधित, एकरस सत्य हैं। आप दूसरेके द्वारा प्रकाशित नहीं, स्वयंप्रकाश आत्मस्वरूप हैं। प्रभो! मैं समझता हूँ कि मेरे लिये आत्मतत्त्वका उपदेश करनेवाला आपके अतिरिक्त देवताओंमें भी कोई नहीं है। ब्रह्मा आदि जितने बड़े-बड़े देवता हैं, वे सब शरीराभिमानी होनेके कारण आपकी मायासे मोहित हो रहे हैं। उनकी बुद्धि मायाके वशमें हो गयी है। यही कारण है कि वे इन्द्रियोंसे अनुभव किये जानेवाले बाह्य विषयोंको सत्य मानते हैं। इसीलिये मुझे तो आप ही उपदेश कीजिये॥ १७॥

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