श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तस्माद् भवन्तमनवद्यमनन्तपारं

सर्वज्ञमीश्‍वरमकुण्ठविकुण्ठधिष्ण्यम्।

निर्विण्णधीरहमु ह वृजिनाभितप्तो

नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये॥ १८

tasmād bhavantamanavadyamanantapāraṃ

sarvajñamīśvaramakuṇṭhavikuṇṭhadhiṣṇyam|

nirviṇṇadhīrahamu ha vṛjinābhitapto

nārāyaṇaṃ narasakhaṃ śaraṇaṃ prapadye|| 18

अर्थ

भगवन्! इसीसे चारों ओरसे दुःखोंकी दावाग्‍निसे जलकर और विरक्त होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप निर्दोष देश-कालसे अपरिच्छिन्‍न, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और अविनाशी वैकुण्ठलोकके निवासी एवं नरके नित्य सखा नारायण हैं। (अतः आप ही मुझे उपदेश कीजिये)॥ १८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें