श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

एकद्वित्रिचतुष्पादो बहुपादस्तथापदः।

बह्व्यः सन्ति पुरः सृष्टास्तासां मे पौरुषी प्रिया॥ २२✎ 2145

ekadvitricatuṣpādo bahupādastathāpadaḥ|

bahvyaḥ santi puraḥ sṛṣṭāstāsāṃ me pauruṣī priyā|| 22

अर्थ

मैंने एक पैरवाले, दो पैरवाले, तीन पैरवाले, चार पैरवाले, चारसे अधिक पैरवाले और बिना पैरके—इत्यादि अनेक प्रकारके शरीरोंका निर्माण किया है। उनमें मुझे सबसे अधिक प्रिय मनुष्यका ही शरीर है॥ २२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2145 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): बह्वॺ: सन्ति → बह्व्यः सन्ति

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें