श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि।

स्पृशन् करीव बध्येत करिण्या अंगसंगतः॥ १३

padāpi yuvatīṃ bhikṣurna spṛśed dāravīmapi|

spṛśan karīva badhyeta kariṇyā aṃgasaṃgataḥ|| 13

अर्थ

राजन्! मैंने हाथीसे यह सीखा कि संन्यासीको कभी पैरसे भी काठकी बनी हुई स्त्रीका भी स्पर्श न करना चाहिये। यदि वह ऐसा करेगा तो जैसे हथिनीके अंग-संगसे हाथी बँध जाता है, वैसे ही वह भी बँध जायगा*॥ १३॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    हाथी पकड़नेवाले तिनकोंसे ढके हुए गड्ढेपर कागजकी हथिनी खड़ी कर देते हैं। उसे देखकर हाथी वहाँ आता है और गड्ढेमें गिरकर फँस जाता है।

    (मुद्रित पृष्ठ 765)

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