श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.29

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

न ह्यंगाजातनिर्वेदो देहबन्धं जिहासति।✎ 1895

यथा विज्ञानरहितो मनुजो ममतां नृप॥ २९

na hyaṃgājātanirvedo dehabandhaṃ jihāsati|

yathā vijñānarahito manujo mamatāṃ nṛpa|| 29

अर्थ

प्रिय राजन्! जिसे वैराग्य नहीं हुआ है, जो इन बखेड़ोंसे ऊबा नहीं है, वह शरीर और इसके बन्धनसे उसी प्रकार मुक्त नहीं होना चाहता, जैसे अज्ञानी पुरुष ममता छोड़नेकी इच्छा भी नहीं करता॥ २९॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1895 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ह्यंगाज्जात → ह्यंगाजात

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