श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.4

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

ओजःसहोबलयुतं बिभ्रद् देहमकर्मकम्।

शयानो वीतनिद्रश्‍च नेहेतेन्द्रियवानपि॥ ४

ojaḥsahobalayutaṃ bibhrad dehamakarmakam|

śayāno vītanidraśca nehetendriyavānapi|| 4

अर्थ

उसके शरीरमें मनोबल, इन्द्रियबल और देहबल तीनों हों तब भी वह निश्‍चेष्ट ही रहे। निद्रारहित होनेपर भी सोया हुआ-सा रहे और कर्मेन्द्रियोंके होनेपर भी उनसे कोई चेष्टा न करे। राजन्! मैंने अजगरसे यही शिक्षा ग्रहण की है॥ ४॥

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