श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

मुनिः प्रसन्‍नगम्भीरो दुर्विगाह्यो दुरत्ययः।

अनन्तपारो ह्यक्षोभ्यः स्तिमितोद इवार्णवः॥ ५

muniḥ prasannagambhīro durvigāhyo duratyayaḥ|

anantapāro hyakṣobhyaḥ stimitoda ivārṇavaḥ|| 5

अर्थ

समुद्रसे मैंने यह सीखा है कि साधकको सर्वदा प्रसन्‍न और गम्भीर रहना चाहिये, उसका भाव अथाह, अपार और असीम होना चाहिये तथा किसी भी निमित्तसे उसे क्षोभ न होना चाहिये। उसे ठीक वैसे ही रहना चाहिये, जैसे ज्वार-भाटे और तरंगोंसे रहित शान्त समुद्र॥ ५॥

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