श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

समृद्धकामो हीनो वा नारायणपरो मुनिः।

नोत्सर्पेत न शुष्येत सरिद्भिरिव सागरः॥ ६

samṛddhakāmo hīno vā nārāyaṇaparo muniḥ|

notsarpeta na śuṣyeta saridbhiriva sāgaraḥ|| 6

अर्थ

देखो, समुद्र वर्षाऋतुमें नदियोंकी बाढ़के कारण बढ़ता नहीं और न ग्रीष्म-ऋतुमें घटता ही है; वैसे ही भगवत्परायण साधकको भी सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिसे प्रफुल्लित न होना चाहिये और न उनके घटनेसे उदास ही होना चाहिये॥ ६॥

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