श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.21

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णां सन्तत्य वक्त्रतः।

तया विहृत्य भूयस्तां ग्रसत्येवं महेश्‍वरः॥ २१

yathorṇanābhirhṛdayādūrṇāṃ santatya vaktrataḥ|

tayā vihṛtya bhūyastāṃ grasatyevaṃ maheśvaraḥ|| 21

अर्थ

जैसे मकड़ी अपने हृदयसे मुँहके द्वारा जाला फैलाती है, उसीमें विहार करती है और फिर उसे निगल जाती है, वैसे ही परमेश्‍वर भी इस जगत‍्को अपनेमेंसे उत्पन्‍न करते हैं, उसमें जीवरूपसे विहार करते हैं और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं॥ २१॥✎ 1741

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1741 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्रियाशक्ति-प्रधान → क्रियाशक्तिप्रधान

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