श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया।

स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् वापि याति तत्तत्सरूपताम्॥ २२

yatra yatra mano dehī dhārayet sakalaṃ dhiyā|

snehād dveṣād bhayād vāpi yāti tattatsarūpatām|| 22

अर्थ

राजन्! मैंने भृंगी (बिलनी) कीड़ेसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि यदि प्राणी स्नेहसे , द्वेषसे अथवा भयसे भी जान-बूझकर एकाग्ररूपसे अपना मन किसीमें लगा दे तो उसे उसी वस्तुका स्वरूप प्राप्त हो जाता है॥ २२॥

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