श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः।

याति तत्सात्मतां राजन् पूर्वरूपमसन्त्यजन्॥ २३

kīṭaḥ peśaskṛtaṃ dhyāyan kuḍyāṃ tena praveśitaḥ|

yāti tatsātmatāṃ rājan pūrvarūpamasantyajan|| 23

अर्थ

राजन्! जैसे भृंगी एक कीड़ेको ले जाकर दीवारपर अपने रहनेकी जगह बंद कर देता है और वह कीड़ा भयसे उसीका चिन्तन करते-करते अपने पहले शरीरका त्याग किये बिना ही उसी शरीरसे तद्रूप हो जाता है*॥ २३॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    जब उसी शरीरसे चिन्तन किये रूपकी प्राप्ति हो जाती है; तब दूसरे शरीरसे तो कहना ही क्या है? इसलिये मनुष्यको अन्य वस्तुका चिन्तन न करके केवल परमात्माका ही चिन्तन करना चाहिये।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 772)

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