श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.9.4

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

ऋषिरुवाच

जितं ते देवदेवेश प्रपन्‍नार्तिहराच्युत।

वरेणैतावतालं नो यद् भवान् समदृश्यत॥ ४

jitaṃ te devadeveśa prapannārtiharācyuta|

vareṇaitāvatālaṃ no yad bhavān samadṛśyata|| 4

अर्थ

मार्कण्डेय मुनिने कहा—देवदेवेश! शरणागतभयहारी अच्युत! आपकी जय हो! जय हो! हमारे लिये बस इतना ही वर पर्याप्त है कि आपने कृपा करके अपने मनोहर स्वरूपका दर्शन कराया॥ ४॥✎ 1784

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1784 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: शरणागत-भयहारी → शरणागतभयहारी

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