श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.11

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

एतन्‍निर्विद्यमानानामिच्छतामकुतोभयम्।

योगिनां नृप१ निर्णीतं हरेर्नामानुकीर्तनम्॥ ११

etannirvidyamānānāmicchatāmakutobhayam|

yogināṃ nṛpa nirṇītaṃ harernāmānukīrtanam|| 11

अर्थ

जो लोग लोक या परलोककी किसी भी वस्तुकी इच्छा रखते हैं या इसके विपरीत संसारमें दुःखका अनुभव करके जो उससे विरक्त हो गये हैं और निर्भय मोक्षपदको प्राप्त करना चाहते हैं, उन साधकोंके लिये तथा योगसम्पन्‍न सिद्ध ज्ञानियोंके लिये भी समस्त शास्त्रोंका यही निर्णय है कि वे भगवान्‌के नामोंका प्रेमसे संकीर्तन करें॥ ११॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—नृपते गीतं।

    (मुद्रित पृष्ठ 182)

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